किसका किसका शोक मनाऊं....
सीमा में रहकर सीमा पर मिटने का,
निःशस्त्र निरपराधों के तिरंगे में लिपटने का।
गर्वित व्यथित मन को अब कैसे समझाऊँ,
किसका किसका शोक मनाऊँ.....
कोमल सुकुमार पग को तपता छोड़ धूप में,
गिद्ध पत्रकारिता मगन है खबरों की भूख में।
निर्धन असहायों की ये दशा कैसे भुलाऊँ,
किसका किसका शोक मनाऊँ....
सूने शहर में सिसकते सिमटते,
विषाणु के आगे बस बेबस बिलखते।
डर डर के भला समय कैसे बिताऊँ,
किसका किसका शोक मनाऊँ.....
क्रन्दित हृदय चीत्कार को व्याकुल है,
तम घनघोर आस बुझने को आतुर है।
क्षोभित अंतर्मन को कैसे ढाढ़स बंधाऊँ,
किसका किसका शोक मनाऊँ......
-रश्मि मिश्रा
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