तकता तुम्हारी राह कोई पत्थर सा हो गया
इस पर भी तुम्हें ख्याल न आए तो क्या कहें।
बूँद बूँद हाथों से फिसल रही है ज़िन्दगी
अब भी कोई पूछने हाल न आए तो क्या कहें।
हम तो मुनासिब हर जवाबी जिरह को तैयार हैं
फिर भी वो लेकर कोई सवाल न आए तो क्या कहें।
बहकर लहू सरहद पे कहीं जम गया होगा
इस पर भी रगों में उबाल न आए तो क्या कहें।
जहाँ भर के अश्कों को जो अपने दामन में दे पनाह
उसी के हिस्से कोई रूमाल न आए तो क्या कहें।
-रश्मि मिश्रा
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