देखो ये गंदगी फ़ैल रही है
सर्वत्र इसके अंश
गलियों में चौराहों में
हरे भरे दिखते
पर कुम्हलाते चरागाहों में
गंदे पर साफ़ सुथरे से
घरों की नींव
जो भार सहने को मजबूर
लिए कचरे की विरासत
पल पल कराहती है
उन घरों में पनपी गन्दगी
दीवारों से बहती
सड़कों पर पसर जाती है
फिर कोई मासूम
उस ढेर से
अपने मतलब का सामान
टटोलता है
उस गंदगी को देख
मुस्कुराकर उसे
अन्यत्र धकेलता है
इंसानी पौध में
जड़ें जमाती
ये सबसे खेल रही है
गिद्धों ने जो गंदगी
छोड़ दी
नाले से अब वो
नदी बन गयी है
और अब ये तत्पर है
सिंचित करने को
एक सूखी पर
साफ़ जगह को
जहाँ उगेंगी
अभिशप्त फसलें
और उनके बीज
क्या परिस्थिति इसे
गंगा में प्रवाहित करेगी
पर कौन सी गंगा यमुना
इसे समाहित करेगी
शायद हमें ही गिद्ध बनकर
इसे हरना होगा
बड़े ही सधे कदमों से
ये गंदगी विकराल रूप
धर रही है
देखो ये गंदगी
फ़ैल रही है........

