तू मुझसे मिलने जब आये
न जाने कब वो पल आये
है ख्वाहिश तुमसे मिलने तक
न गुज़रे कुछ, न कल आये |
रेत की मानिंद फिसलता वक़्त
तेरी ही आरज़ू हर वक़्त
बुनूं सपने तेरे हर वक़्त
तेरे ही रू-ब-रू हर वक़्त
यूँ ही चलता रहा ये सब
तो शायद वक़्त ढल जाए |
बारिश की बूंदों का चिढ़ाना कैसे न देखूं
हवा के संग तेरी खुशबू का आना कैसे न देखूं
तुम्हें जो देख न पाऊँ तो बोलो और क्या देखूं
मेरा श्रृंगार और दर्पण तुम्ही तो आईने में क्या देखूं
न फिर कोई तसल्ली दो
कि मेरा दिल बहल जाए |

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