Friday, March 4, 2011

कब तक.....

 तू मुझसे मिलने जब आये 
 न जाने  कब वो  पल आये
है ख्वाहिश तुमसे मिलने तक
न गुज़रे  कुछ, न कल आये |                                             

रेत की मानिंद फिसलता वक़्त 
तेरी ही आरज़ू हर वक़्त
बुनूं सपने तेरे हर वक़्त
तेरे ही रू-ब-रू हर वक़्त
यूँ ही चलता रहा ये सब 
तो शायद वक़्त ढल जाए |

बारिश की बूंदों का चिढ़ाना कैसे न देखूं
हवा के संग तेरी खुशबू का आना कैसे न देखूं 
तुम्हें जो देख न पाऊँ तो बोलो और क्या देखूं
मेरा श्रृंगार और दर्पण तुम्ही तो आईने में क्या देखूं
न फिर कोई तसल्ली दो 
कि मेरा दिल बहल जाए | 

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