फिर खास करते हैं आम अवाम की चर्चा,
बजट के बहाने ही सही, सुनो हम आम की चर्चा |
तुमने इन्हें ये न दिया, वो न दिया,
किसकी जेब में तुमने कितना है दिया |
सवालों के छीटों से एक दूजे को सराबोर किया,
कोई इधर तो कोई उधर हमे खींचा है किया |
हमसे बढ़कर हुई इनको हमारे दुःख दर्द की चिंता,
फिर खास करते हैं.........
एक हाथ से देकर ये दोनों हाथ से लेते,
इधर उम्मीद तोड़े हैं उधर फिर आस हैं देते |
हम में से ही होने का कई तो स्वांग हैं करते,
न जाने क्या गजब होगा जो हम अब भी नहीं चेते |
गरीबों को है चिंता चलेगा कैसे अब खर्चा,
फिर खास करते हैं.........
गरीब कैसे ठंड की एक रात काटे हैं,
किसके बच्चों ने बिताये कितने फांके हैं |
पैबंद लगे कपड़ों से कैसे लाज झांके है,
कोई बेघर किसी भी घर को किन नजरों से ताके है |
इसे क्या हल करेगी कभी कोई भी परिचर्चा,
फिर खास करते हैं.........
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