इस स्वतंत्र राष्ट्र में परतंत्र से विचार हैं,
ईमानदारी पे अट्टहास करे भ्रष्टाचार है |
द्वंद्व है प्रचंड किन्तु समाधान का अभाव है,
विचारते अनेक पर दिशाहीन सी हर नाव है |
राजनीति शर्मसार, हुई कैसी ये चूक है,
भूत अकल्पनीयता में ताकता सा मूक है |
लाचार बेरोजगार परेशानियों से जूझता,
मँहगाई का बोझ लिए आमजन है घूमता |
आतंकवाद का भय जन मानस में व्याप्त है,
हताशा घर करने को इतना ही पर्याप्त है |
सुख शांति सम्पदा का कहीं दब गया संदूक है,
भूत अकल्पनीयता में ताकता सा मूक है |
इस अर्धविकसित देश का यही दुर्भाग्य है,
स्वार्थी सत्ता लोलुपों के हाथ इसका भाग्य है |
आक्रोशित आवाम किन्तु तमाशबीन मात्र हैं सभी,
सब अपने ही में व्यस्त कोई शुरुआत तो करे कभी |
प्रथा बन रही व्यथा कर रही क्या सुलूक है,
भूत अकल्पनीयता में ताकता सा मूक है |

Ab apna desh vikasshil nahi raha...........
ReplyDeleteArdhyaviksit deso mein ginti hone lagi hai hamari
but jo bhi ho ye blogon mein best blog hai..............