Tuesday, March 8, 2011

सच

किस्सों कहानियों का कुछ ऐसा दावा है,
लाख बाधाएँ सही  पर जीत  जाता सच |
सपनों को  पीछे छोड़  हकीक़त टटोलें तो,
क्यों कभी अपनी हार पर आंसू बहाता सच |

ज़िंदगी के अनुभवों  ने अब तक ये  सिखाया है,
हम बड़ों को बच्चों सा अक्सर नखरे दिखाता सच |

झूठ  झट से शहर  सारा  घूम  आता है,
जूतों के फीते बांधता पीछे छूट जाता सच |

दुःख में तो  इसका सामना करना ही है  सबको,
सुख की रोशनी में खुद को अँधेरे में छुपाता सच |

झूठ मीठे  स्वाद सा  सबको लुभाता  है,
कड़वाहट का दंश खुद पर झेल जाता सच |

एक छोटा झूठ  भी डर का  पहाड़ हो जाता,
शांति समतल में हरी फसल सा लहलहाता सच |

2 comments:

  1. सच की सार्थकता निम्बोली सी कड़वी होती है, जो अपने कड़वे कसेंधेपन के साथ तमाम औषधीय गुणों से समाहित होता है | बढ़िया रचना...

    कृपया कोमेंट के वर्ड भेरिफिकेसन को हटा दें ....

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  2. ब्लॉग के सेटिंग में जाकर कमेन्ट पेज पर वर्ड वेरिफिलेसन को हटा दें

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