किस्सों कहानियों का कुछ ऐसा दावा है,
लाख बाधाएँ सही पर जीत जाता सच |
सपनों को पीछे छोड़ हकीक़त टटोलें तो,
क्यों कभी अपनी हार पर आंसू बहाता सच |
ज़िंदगी के अनुभवों ने अब तक ये सिखाया है,
हम बड़ों को बच्चों सा अक्सर नखरे दिखाता सच |
झूठ झट से शहर सारा घूम आता है,
जूतों के फीते बांधता पीछे छूट जाता सच |
दुःख में तो इसका सामना करना ही है सबको,
सुख की रोशनी में खुद को अँधेरे में छुपाता सच |
झूठ मीठे स्वाद सा सबको लुभाता है,
कड़वाहट का दंश खुद पर झेल जाता सच |
एक छोटा झूठ भी डर का पहाड़ हो जाता,
शांति समतल में हरी फसल सा लहलहाता सच |
सच की सार्थकता निम्बोली सी कड़वी होती है, जो अपने कड़वे कसेंधेपन के साथ तमाम औषधीय गुणों से समाहित होता है | बढ़िया रचना...
ReplyDeleteकृपया कोमेंट के वर्ड भेरिफिकेसन को हटा दें ....
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