Wednesday, March 9, 2011

थोड़ा थोड़ा चुभता है

मेरी ही शाखों पर एक दिन जिन सपनों ने आकार लिया
उन सपनों का मुझको यूँ ठुकराना थोड़ा थोड़ा चुभता है

हर पतझड़ के बाद मैं फिर से हरी भरी हो उठती हूँ
बस टूटे पत्तों का साथ न आना थोड़ा थोड़ा चुभता है

मेरे जिंदादिल लम्हों की जो शहर मिशालें देता था
उसकी सूनी गलियों का वीराना थोड़ा थोड़ा चुभता है

मैंने खुद से भी पहले जिनकी खुशियों की चिंता की
उन अपनों का मुझे सताना थोड़ा थोड़ा चुभता है

उन्मुक्त द्विजों सी यहाँ वहां मैं सदा उड़ानें भरती हूँ
पिंजरे में पंछी का शोर मचाना थोड़ा थोड़ा चुभता है

नदियों की कल कल में भी तो मीठा सा कोलाहल है
इन नदियों में सरहद बनवाना थोड़ा थोड़ा चुभता है

परिवर्तन की सोच युवा कल्पना का शहर बसाता
एक झटके से बुनियादें हिल जाना थोड़ा थोड़ा चुभता है

मुझको ईश्वर की सत्ता से कभी कोई इन्कार नहीं
किन्तु धर्म हेतु दंगे फैलाना थोड़ा थोड़ा चुभता है

तपती दोपहरी के बाद सभी को शाम सुहानी लगती है
पर किसी गरीब का भूखे सो जाना थोड़ा थोड़ा चुभता है

सब मसलों को भूल कभी मैं अपनी खातिर जी तो लूं
पर रोती  बस्ती में  मुस्काना  थोड़ा थोड़ा चुभता है

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