Sunday, March 13, 2011

गंदगी

देखो ये गंदगी फ़ैल रही है
सर्वत्र इसके अंश
गलियों में चौराहों में
हरे भरे दिखते
पर कुम्हलाते चरागाहों में
गंदे पर साफ़ सुथरे से
घरों की नींव
जो भार सहने को मजबूर
लिए कचरे की विरासत
पल पल कराहती है
उन घरों में पनपी गन्दगी
दीवारों से बहती 
सड़कों पर पसर जाती है
फिर कोई मासूम
उस ढेर से 
अपने मतलब का सामान
टटोलता है
उस गंदगी को देख
मुस्कुराकर उसे
अन्यत्र धकेलता है
इंसानी पौध में
जड़ें जमाती
ये सबसे खेल रही है
गिद्धों ने जो गंदगी
छोड़ दी
नाले से अब वो
नदी बन गयी है
और अब ये तत्पर है
सिंचित करने को
एक सूखी पर
साफ़ जगह को
जहाँ उगेंगी 
अभिशप्त फसलें
और उनके बीज
क्या परिस्थिति इसे
गंगा में प्रवाहित करेगी
पर कौन सी गंगा यमुना
इसे समाहित करेगी
शायद हमें ही गिद्ध बनकर
इसे हरना होगा
बड़े ही सधे कदमों से
ये गंदगी विकराल रूप
धर रही है
देखो ये गंदगी
फ़ैल रही है........ 

4 comments:

  1. Really amazing, aap bahut achha likh rahi hai....aap ki her line se aap ke vicharo ki gahrai dikhti hai...keep continue...

    ReplyDelete
  2. लाजवाब... कवी को सौंदर्यबोध कब और कहाँ हो जाए कहना मुश्किल है | बेहतरीन रचना के लिए बधाई |

    ReplyDelete